मंदसौर का काला सच

गौतम कात्यायन की कलम से

मंदसौर में जो हो रहा है इसकी नींव दो-तीन वर्ष पूर्व ही रखी जा चुकी थी। तस्वीर देखिए सड़क पर उतरे किसान के नाम पर ठगी करने वाले शांतिदूतों के उत्पात और खेत में फसल को देखते किसान दम्पति। गांजा अफ़ीम और नशीले पदार्थों की खेती और व्यवसाय में लगे शांतिदूतों ने अपनी विध्वंसक गतिविधि और उत्पात मचाना शुरू कर दिया था। लेकिन इफ़्तार पार्टी में टोपी पहनकर चाव से इफ्तारी खाने वाले श्रीमान Shivraj Singh Chauhan जी इनके लिए यमराज़ बनने की जगह संरक्षक बन गए थे।

आप सबों को पिछले वर्ष की घटना का स्मरण करवाना चाहूंगा। बात जुलाई या सितंबर महीने की रही होगी। ईद के मौके पर मध्यप्रदेश का मंदसौर दो दिन पूरी तरह बंद रहा। इस बात पर सोशल मीडिया सहित सभी मंचो पर बड़ी जोरशोर से ख़ुशी मनायी जा रही थी, इसे ऐतिहासिक उपलब्धि के रूप में प्रचारित किया जा रहा था। मंदसौर बंद का कारण यह बताया जा रहा था कि, ‘शब-ए-बारात’ के दिन मुस्लिम गुंडों ने शहर में पूरी रात जमकर हिंसक उपद्रव किया था। हिन्दुओं के सैकड़ों घरों पर खुलकर पथराव किया था, उनके खिड़की दरवाज़े और घरों के बाहर खड़ी गाड़ियां तोड़ी थीं। पुलिस में शिकायत के बाद भी उन मुस्लिम गुंडों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं होने के विरोध में मंदसौर की जनता को अंततः यह कदम उठाना पड़ा।

मंदसौर की घटना किसी हर्ष या गर्व की नहीं बल्कि शोक और शर्म का विषय था क्योंकि मंदसौर शहर पकिस्तान, बांग्लादेश में नहीं बल्कि हिंदुस्तान में है। मंदसौर शहर जम्मू-कश्मीर, केरल या पश्चिम बंगाल में नहीं बल्कि मध्यप्रदेश में हैं। मध्यप्रदेश में पिछले 14 वर्षों से मुस्लिम लीग, कम्युनिस्ट पार्टी, कांग्रेस, सपा या बसपा की नहीं बल्कि राष्ट्रवादी Bharatiya Janata Party (BJP) की प्रचण्ड बहुमत वाली सरकार है। इसके बावजूद मंदसौर में गांजा अफीम नशा की खेती और व्यवसाय करने वाले मुस्लिम गुंडे खुलेआम रातभर हिन्दुओं पर कहर बरपाया और पुलिस हिन्दुओं का करूण क्रंदन नहीं सुनी। उन्हें आक्रान्त और आतंकित करने वाले मुस्लिम गुंडों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करके उनके हौंसले बुलंद करती रही। अतः मंदसौर के हिन्दू मजबूर होकर यह कदम उठा लिए। मंदसौर की बंद पर मनाया गया जश्न और उत्सव मंदसौर के हिन्दुओं के जख्मों पर नमक की तरह था। क्योंकि किसी शहर का बंद केवल मौखिक लफ़्फ़ाज़ी का नाम नहीं है। छोटे बड़े हर दुकानदार ने उसके लिए अपनी दो दिन की कमाई की आहुति इसलिए दी क्योंकि बेख़ौफ़ बर्बर मुस्लिम गुंडों से उनकी रक्षा करने के बजाय, उन मुस्लिम गुंडों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करके, सरकार उन मुस्लिम गुंडों के पक्ष में खड़ी दिखाई दी थी।

मंदसौर कोई दिल्ली, मुंबई, कोलकाता, भोपाल, लखनऊ जैसा महानगर नहीं। उस छोटे से शहर में यदि रोज कमाने खाने वाले दैनिक मजदूर ने यदि दो दिन काम नहीं किया तो उनमें से कई के घरों में चूल्हा भी नहीं जला होगा, बच्चे भूखे सोये होंगे। और यह चूल्हा इसलिए नहीं जला होगा, उसके बच्चे इसलिए भूखे सोये थे। क्योंकि वह मजदूर हिन्दू था और मुस्लिम गुंडों के आतंक और अत्याचार की आग में झुलस रहा था। शर्म की बात यह रही कि उस हिन्दू दैनिक मजदूर को उस सरकार के शासन में यह सब सहना पड़ रहा है, जिसको हिन्दुओं ने लगातार प्रचंड बहुमत से सत्ता सौपीं।

इसीलिए मेरा व्यक्तिगत मानना है कि, मंदसौर की घटना मप्र की भाजपा नहीं शिवराज सिंह चौहान सरकार के मुंह पर जोरदार थप्पड़ सरीखी है। इफ्तारी खाकर अपने वोट बैंक को छोड़ दूसरे की हितैषी बनने वाली सरकार के कुकर्म का परिणाम है। शिवराज सिंहजी यमराज़ बनिए शांतिदूतों के सामने झुकने की जगह उनको जहन्नुम 72 हूरों के पास पहुंचाइए। खुद के लिए न सही वोट देने वाले हिन्दू, आम किसान, कार्यकर्ताओं और संगठन की प्रतिष्ठा को मटियामेट होने से बचाइए।

 

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