माता रानी की कृपा सम्पूर्ण जगत पर हो…….

आज दोपहर माता रानी के एक पंडाल में खड़ा था इच्छा हुई कि माँ से कुछ मांग लू पर क्या इस असमंजस में मन के अंदर कई ख्याल एक साथ आने लगे- नौकरी में तरक्की, बिजनेस का अच्छा होना, परिवार में सबकी अच्छी सेहत, दीर्घ आयु, धन सम्पदा, जगह जमीन, घर मकान और न जाने क्या-क्या| तभी एक वृद्ध तीन बच्चो (एक लड़का दो लडकी) के साथ पूजा पंडाल में आई, साड़ी कई बार पहनी हुई बच्चियों के कपड़े भी वैसे ही थे लड़का जो कि सबसे छोटा था उसके पैरो में नये जुते जिसके गंदे न होने का ख्याल उसकी दोनों बहने कर रही थी पर बहनों और बूढी के पैरो में चप्पल तक नही थे| आरती में डालने को पैसे थे नही इसलिए कोई पूजा कार्यकर्ता सर पे टीका नही लगा रहा था या यु कहिये कि इच्चिछत नही था, बूढी माता कुछ देर तक इंतजार की, फिर स्वयम से बच्चो को टीका लगा दी; सबको माता रानी को प्रणाम करने बोली, बच्चे गुब्बारे की जिद्द कर रहे थे, बूढी अपने बेटे को कोसने लगी ” बरिश दिन के दिन भी बाप के तोहनी के छुट्टी न मिलऊ; अईसन नौकरी कौन काम के”| प्रतीत हुआ कि बच्चो के पिता कही बाहर रहकर कुछ काम करते है और दशहरे की भी उसको छुट्टी नही मिली|

बूढी लडके को गोद में लेकर वापस चल दी और बच्चियां पीछे पीछे चल दी|

मैं उनको देर तक देखता रहा जबतक वो सब आँखों से ओझल न हो गये, जब वो आधा-अधुरा परिवार जिसका मुखिया पर्व में भी अपने बच्चो और परिवार से दूर था, दूर रहकर भी नये कपड़े और चप्पल बच्चो के लिए जूटा नही पाया ; उस घर कि मालकिन जो तंगहाल में दशहरे के दिन को भी घर के चारदीवारी में रहकर बिताने को मजबूर है| बच्चे जो एक गुबारे के लिए तरस गये और शायद जवानी तक आभाव में पुरे परिवार को एकसाथ न देख सके| वो बूढी माता जो इस उम्र में भी एक खुशहाल जीवन के परे है और शायद तंगहाल में ही प्राण त्याग दे; आँखों से ओझल हो गया| पीड़ा से हृदय विह्वल हो उठा माता रानी कि तरफ मै वापस मुडा और दिल से एक ही प्रार्थना की-

“हे माता रानी ! आपकी कृपा सम्पूर्ण जगत पर हो|”

क्योकि अगर जगत जीने लायक रहेगा तो मै अपनी खुशी की चिंता स्वयम कर लूँगा अपने कर्मो के बल पर| आप सब को दशहरा और विजयादशमी की अनेको शुभकामनाये|

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