वामपंथियों का सच

  1. ####$वामपंथियों की असलियत####
    जेएनयू की प्रोफेसर जोया हसन ने इंडिया टुडे में एक लेख लिखा है और इसमें कहा है कि भारतीय विश्वविद्यालयों की असहमति और विचार विमर्श की संस्कृति गंभीर चुनौती से जूझ रही हैं क्योंकि नरेंद्र मोदी सरकार सरकारी और निजी विश्वविद्यालयों के ओरियंटेशन और पाठ्यक्रमों को सुनिश्चित तरीकों से प्रभावित करने की कोशिश कर रही है ताकि भारतीय जनता पार्टी और संघ परिवार के हिंदू राष्ट्रवाद की विचारधारा को इस में समायोजित किया जा सके। लगता है जोया जी इन संस्थानों पर से वामपंथियों के नियंत्रण कामजोड होने से काफी दुखी हैं।आगे जोया हसन जी ने इस बात को गारंटी के साथ कहा है कि विश्वविद्यालयों में जो वामपंथी बुद्धिजीवी और छात्र संगठन है वे असहमति को पर्याप्त जगह देते हैं और अपने विचार धारा से विपरीत विमर्श का भी सम्मान करते हैं । उनके कहने का आशय यह भी है वामपंथियों का बौद्धिक स्तर निरापद रूप से उत्कृष्ट कोटि का और तार्किक होता है ।
    वामपंथी छात्र संगठन के लोग कितने टोलरेंट होते हैं इस बात का सबूत 6 मार्च 2016 को पश्चिम बंगाल के जाधवपुर विश्वविद्यालय की एक घटना से स्पष्ट हो जाता है । बुद्धा इन ट्रैफिक जाम के निदेशक विवेक अग्निहोत्री अपने फिल्म के प्रदर्शन के लिए जाधवपुर यूनिवर्सिटी पहुंचे ।यह फिल्म अर्बन नक्सल पर बनाई गई थी और बताया गया था किस प्रकार से शहरों में अर्बन नक्सलियों का नेक्सस काम करता है। इसमें तथाकथित रूप से बुद्धिजीवियों के नंगे सच्चाई के बारे में बताया गया था यानी यह फ़िल्म हिंसक वामपंथ के खिलाफ थी। विवेक अग्निहोत्री जैसे ही यूनिवर्सिटी के गेट के अंदर पहुंचे वैसे ही वामपंथी छात्र संगठनों के लोगों ने उन पर चिल्लाना शुरू कर दिया और लाठी डंडों से उस गाड़ी पर प्रहार शुरू कर दिया जिस गाड़ी के अंदर वे बैठे हुए थे , किसी तरह विवेक अग्निहोत्री ने अपनी जान को बचाया । यह एक बड़ा हीी सुंदर नमूना है वामपंथी लोगों के दूसरों के प्रति सहिष्णुता का ।
    ये कितने बौद्धिक और तथ्य परक होते हैं इस बात का पता इस घटना से चलता है- बात 1998 की है ,एक टीवी डिबेट में प्रसिद्ध वामपंथी इतिहासकार के एम श्रीमाली बैठे हुए थे। उन्होंने कहा भारतीय इतिहास अनुसंधान परिषद की बागडोर ऐसे लोगों के हाथों में सौंपी जा रही है जो इतिहास के तथ्यों के साथ तोड़ मरोड़ कर पेश करते हैं।एंकर मनोज रघुवंशी ने पूछा एकाद उदाहरण बताइए। श्रीमाली ने कहा प्राचीन भारत में गौ मांस खाया जाता था लेकिन ये लोग इस तथ्य को दबा देते हैं ।
    मनोज रघुवंशी ने कहा – इसका क्या प्रमाण है ?
    श्री माली ने कहा- इसके सैकड़ों लिखित प्रमाण मौजूद है ।रघुवंशी जी ने कहा-किस वेद में किस ग्रंथ में और किस श्लोक में है लिखा हुआ है?
    श्रीमाली जी ने कहा- मेरे पास वेद नहीं है ।
    जब उनके पास वेद लाया गया तो वे गुस्से में आ गये और बगले झांकने लगे।
    तब मनोज जी ने कहा कि मैं ऐसे आपको एक से अधिक श्लोक दिखा सकता हूं जिसमें गौ मांस को निषिद्ध किया गया है और इस ऐसा करने से मना किया गया है। उन्होंने अनेक श्लोकों को उद्धृत किया तो श्रीमाली ने धृष्टता के साथ कहा अगर यह लिखा गया है कि गौमांस नही खााना चााहिये तो इससे यह कहां प्रमाणित होता है कि लोग गौ मांस नहीं खाते थे। यानी केवल संभावना के आधार पर यह निष्कर्ष निकालना की वैदिक लोग गौ मांस खाते थे यह कहां की तार्किकता है । वामपंथी कितने तार्किक होते हैं और कितने तथ्यपरक होते हैं-? इस उदाहरण से समझा जा सकता है ।उनका नैरेटिव सतही और संस्कृति विरोधी होता है क्योंकि मार्क्स कहते हैं जब तक अतीत के बोझ से बाहर नही आएंगे तब तक क्रांति नही हो सकती।इसलिए उनका विश्लेषण का दायरा मार्क्स के द्वारा तय मानदण्डों से बाहर निकल ही नही पाता। उनके निष्कर्षों के पहले इन जुमलों को पढ़ सकते हैं जैसे “ऐसा लगता है ” , “संभवतः” , ” ऐसा हुआ होगा ” , “अधिकांशतः” आदि। इन वामपंथियो ने इतिहास को तोड़ मरोड़ कर पेश किया है जिसे सही करने की अत्यधिक जरूरत है ।

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