नीतिश अब जो कर सकते हैं उसे जानिये

 

पहला विकल्प 
वर्तमान परिस्थिति में नीतिश के पास बड़ा ही सीमित   विकल्प है |उनके लिए सबसे आसान स्थिति है कि वे राजद और कंग्रेस के साथ बने रहें क्योंकि परिस्थितियों से मजबूर लालू और कांग्रेस हमेशा उनसे सहमत रहते हैं |वे उनके साथ आराम से  पांच साल अपनी सरकार चला सकते हैं |लेकिन इसका एक नुकसान  भी है – अगर कथित बेनामी सम्पति की जांच के मामले में  लालू के कुनबे पर आयकर का कोड़ा चला तो फैसला करना मुश्किल हो जाएगा |हो सकता है कि जो लोग १९१५ में उनकी ताकत हुआ करते थे वो आगे उनके लिए एक बोझ बन कर रह जाएँ |

दूसरा विकल्प 

दूसरा विकल्प एन डी ए के साथ जाना है | अगर ऐसा होता है तो बीजेपी छोटे घटक के तौर पर सरकार में शामिल हो जायेगी |नीतिश जो चाहे सो कर सकते हैं |केंद्र का भी भरपूर सहयोग मिलेगा पर यह २०१५ के जनादेश का अपमान होगा यह एक तरह से नरेंद्र मोदी के सामने समर्पण होगा जो नीतिश के वजूद के लिए ठीक नहीं रहेगा जिसे वे भी अच्छी  तरह से समझते है |बीजेपी केन्द्रीय नेतृत्व के लिए अब नीतिश की उपयोगिता बेहद सिमित है | मोदी और अमित शाह की जोड़ी के  विचारधारा से समझौता नहीं करने की आदत नीतिश पर भारी पड़ सकती है |

तीसरा विकल्प 

पहले और दुसरे विकल्प में सीधे तौर पर उनकी छवि के लिए खतड़े की संभावना बरकरार है |ऐसी स्थिति में इनके लिए एकला चलो की स्थिति  सबसे बेहतर हो सकती है |यहाँ इनकी छवि तो बच  सकती है पर चुनावी शतरंज में ये पिट सकते हैं जैसा की लोकसभा के चुनाओं में हुआ |

इनकी अकेले की स्थिति ऐसी नहीं है कि वे अकेले अपनी सरकार बना सकें |चुनावी राजनीति आदर्शवादी पैतरों से नहीं चलती ,जो एक स्थापित तथ्य है |तीसरा विकल्प बीजेपी के हीत में हो सकता है क्योंकि लालू और नीतिश में से किसी में इतनी ताकत नहीं है कि वे अकेले अकेले बीजेपी से लड़ सकें |

देखें आगे क्या होता है ……

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